दुःख
रजतरश्मियों की छाया में धूमिल घन सा वह आता;इस निदाघ के मानस में करुणा के स्रोत बहा जाता।…
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रजतरश्मियों की छाया में धूमिल घन सा वह आता;इस निदाघ के मानस में करुणा के स्रोत बहा जाता।…
क्यों इन तारों को उलझाते?अनजाने ही प्राणों में क्योंआ आ कर फिर जाते? पल में रागों को झंकृत…
किस सुधिवसन्त का सुमनतीर,कर गया मुग्ध मानस अधीर? वेदना गगन से रजतओस,चू चू भरती मन-कंज-कोष,अलि सी मंडराती विरह-पीर!…
चुभते ही तेरा अरुण बान!बहते कन कन से फूट फूट,मधु के निर्झर से सजल गान। इन कनक रश्मियों…