परशुराम की प्रतीक्षा
खण्ड (1) गरदन पर किसका पाप वीर ! ढोते हो ? शोणित से तुम किसका कलंक धोते…
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खण्ड (1) गरदन पर किसका पाप वीर ! ढोते हो ? शोणित से तुम किसका कलंक धोते…
दिल्ली फूलों में बसी, ओस-कण से भीगी, दिल्ली सुहाग है, सुषमा है, रंगीनी है, प्रेमिका-कंठ में पड़ी मालती…
यह कैसी चांदनी अम के मलिन तमिर की इस गगन में, कूक रही क्यों नियति व्यंग से इस…
लोहे के पेड़ हरे होंगे, तू गान प्रेम का गाता चल, नम होगी यह मिट्टी ज़रूर, आँसू के…
सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी, मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है; दो राह, समय के रथ…