हरिविमुख-निन्दा
अचंभो इन लोगनि कौ आवै । छाँड़े स्याम-नाम-अम्रित फल, माया-विष-फल भावै । निंदत मूढ़ मलय चंदन कौं राख…
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अचंभो इन लोगनि कौ आवै । छाँड़े स्याम-नाम-अम्रित फल, माया-विष-फल भावै । निंदत मूढ़ मलय चंदन कौं राख…
हरि-रस तौंऽब जाई कहुँ लहियै । गऐं सोच आऐँ नहिं आनँद, ऐसौ मारग गहियै । कोमल बचन, दीनता…
जा दिन संत पाहुने आवत । तीरथ कोटि सनान करैं फल जैसी दरसन पावत । नयौ नेह दिन-दिन…
किते दिन हरि-सुमिरन बिनु खोए । परनिंदा रसना के रस करि, केतिक जनम बिगोए । तेल लगाइ कियौ…
सब तजि भजिऐ नंद कुमार । और भजै तैं काम सरै नहिं, मिटै न भव जंजार । जिहिं…
चकई री, चलि चरन-सरोवर, जहाँ न प्रेम वियोग । जहँ भ्रम-निसा होति नहिं कबहूँ, सोइ सायर सुख जोग…
अपुनपौ आपुन ही बिसर्यौ । जैसे स्वान काँच-मंदिर मैं, भ्रमि-भ्रमि भूकि पर्यौ । ज्यौं सौरभ मृग-नाभि बसत है,…