यह त्यौहार कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की द्वादशी को मनाया जाता है. सुबह नित्यकर्म से निवृत होकर गाय तथा बछडे़ का पूजन किया जाता है. आधुनिक समय में कई लोगों के घरों में गाय नहीं होती है. वह किसी दूसरे के घर की गाय का पूजन कर सकते हैं. यदि घर के आसपास भी गाय और बछडा़ नहीं मिले तब गीली मिट्टी से गाय तथा बछडे़ को बनाए और उनकी पूजा करें. इस व्रत में गाय के दूध से बनी खाद्य वस्तुओं का उपयोग नहीं किया है!
गोवत्स द्वादशी की कथा |
प्राचीन समय में पूर्व भारत में सुवर्णपुर नाम का नगर था. उस नगर में देवदानी राजा राज्य करता था. उसके पास एक गाय और एक भैंस थी. राजा की दो रानियाँ थी. एक का नाम नंदा तो दूसरी का नाम सुनंदा था.नंदा भैंस से सहेली के समान प्यार करती थी और सुनंदा गाय से सहेली के समान और बछडे़ से पुत्र समान प्यार करती थी. एक दिन भैंस नंदा से कहती है कि गाय, बछडा़ होने पर सुनंदा रानी मुझसे ईर्ष्या करती है.नंदा कहती है यदि ऎसी बात है तब मैं सब ठीक कर लूंगी. नंदा उसी दिन गाय के बछडे़ को काटकर गेहूं की राशि में दबा देती है. इस बात के विषय में किसी को भी पता नहीं चला. राजा जब भोजन करने बैठा तो मांस तथा खून की वर्षा होने लगी. महल में सभी ओर खून तथा मांस दिखाई देने लगा. राजा के भोजन की थाली में मल-मूत्र दिखाई देने लगा. ऎसा देखकर राजा को बहुत चिन्ता हुई. उसी समय आकाशवाणी होती है कि हे राजा! तेरी रानी ने गाय के बछडे़ को काटकर गेहूं की राशि में दबा दिया है. इसी कारण यह सब हो रहा है. कल गोवत्स द्वादशी है. इसलिए आप कल भैंस को नगर से बाहर निकालें और गाय तथा बछडे़ की पूजा करें. आप कल गाय का दूध तथा कटे फलों का भोजन में त्याग करें. इससे तुम्हारा पाप नष्ट हो जाएगा और बछडा़ भी जिन्दा हो जाएगा!
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