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सुभद्रा कुमारी चौहान

वेदना

22 Mar 2018 · 1 मिनट पठन · COMPANY MITRA

दिन में प्रचंडरवि-किरणें
मुझको शीतल कर जातीं।
परम धुरज्योत्स्ना तेरी,
हे शशि! है मुझे जलाती॥

संध्या की सुमधुर बेला,
सब विहग नीड़ में आते।
मेरीआँखों के जीवन,
बरबस मुझ से छिन जाते॥

नीरव निशि की गोदी में,
बेसुध जगती जब होती।
तारों से तुलना करते,
मेरीआँखों के मोती॥

झंझा के उत्पातों सा,
बढ़ता उन्माद हृदय का।
सखि! कोई पता बता दे,
मेरे भावुक सहृदय का॥

जब तिमिरावरण हटाकर,
ऊषा की लालीआती।
मैं तुहिन बिंदु सी उनके,
स्वागत-पथ पर बिछ जाती॥

खिलते प्रसूनदल, पक्षी
कलरव निनाद कर गाते।
उनकेआगम का मुझको
मीठा संदेश सुनाते॥

(सुभद्राकुमारी चौहान)

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