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सूर्यकांत निराला

भिक्षुक

22 Feb 2018 · 1 मिनट पठन · COMPANY MITRA

वह आता –
दो टूक कलेजे के करता पछताता

पथ परआता ।
पेट-पीठ दोनों मिलकर हैं एक,
चल रहा लकुटिया टेक,
मुट्ठी-भर दाने को – भूख मिटाने को
मुँह फटी-पुरानी झोली का फैलाता –
दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ परआता।
साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाये,
बायें से वे मलते हुए पेट को चलते,
और दाहिना दया-दृष्टि पाने की ओर बढ़ाये।
भूख से सूख होंठ जब जाते
दाता-भाग्य-विधाता से क्या पाते?-
घूँट आँसुओं के पीकर रह जाते ।
चाट रहे जूठी पत्तल वे सभी सड़क पर खड़े हुए,
और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए।

 (सूर्यकांतत्रिपाठी ‘निराला’)

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