दिवजाता शुभ्राम्बर-विलसित,
नूतन, आभा से उद्भासित,
भू-सुषमा की एक स्वामिनी
शोभन आलोकित विहान दे ।
अरुण किरण के वाजि चन्द्र-रथ-
ले करती जा पार क्रान्ति-पथ,
निशि-तम-हारिणि हे विभावरी
हमें यजन गौरव महान दे ।
सुगम तुझे गति है अचलों पर,
सुतर शान्त लहरों का सागर,
निश्चित क्रम विस्तृत पथ-चारिणि,
स्वत: दीप्त तू हमें मान दे।
दिन दिन नव नव छबि में आकर,
गृह गृह में आलोक बिछाकर,
ज्योतिष्मती प्रात की बेला,
ऐश्वर्यों में श्रेष्ठ दान दे ।
जन न ठहरते पथ में पग धर,
खग न रुके नीड़ों में पल भर,
जिसका उदय वलोक-वही
अरुणा अब हमको सजग प्राण दे ।
जागे द्विपद चतुष्पद आकुल,
दिग्दिगन्तचारी पुलकाकुल,
जिसका आगम देख उषा वह
कर्म-पन्थ सबको समान दे ।
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