सज गया दक्षिणा का देखो वह महत यान,
सब जाग उठे हैं अमृत पुत्र भी कान्तिमान !
आर्या अरुणा आरूढ़ आ रही तिमिर पार,
गृह गृह पहुँचाने ज्योतिर्धन का अतुल भार ।
जेता संग्रामों की ऐश्वर्यों की रानी,
चेतन जग से पहले जागी वह कल्याणी;
यह युवति सनातन प्रतिदिन नूतन बन आती,
वह प्रातयज्ञ में प्रथम पुरोहित सी भाती ।
कर देवि ! सुजाते ! ऐश्वयों का सम वितरण,
सविता साक्षी, हैं हम सबके अकलुष तन मन;
आलोक बिछाती प्रियदर्शन छबिमय प्रतिदिन,
उजला कर जाती हर घर का तममय आँगन ।
ज्योतिर्वसना तू शनै: शनै: उतरी भू पर,
निधियों में तेरा दान रहा सबसे भास्वर;
यो सूर्य वरुण की स्वसा ! गूंजते तेरे स्वर,
हारे विद्वेषी, रथी रहें हम विजयी वर ।
हो ऊर्ध्वगामिनि सत्य पुरंध्री वाक् मधुर;
प्रज्ज्वलित पूत यह अग्निशिखा उठती ऊपर,
तम के परदे में जो निधियां थीं अन्तर्हित,
अब दीप्तिमतो बेला में होतीं उद्भासित ।
जाती रजनी, आती है अरुणा क्षिप्रचरण,
हैं रूप भिन्न पर एक संचरण का बन्धन;
वह अन्तरिक्ष में तिमिर-तोम फैला जाती,
जाज्वल्यमान स्पन्दन पर यह पथ में आती ।
जो रूप आज, कल भी उसका प्रत्यावर्तन,
करती अरुणायें वरुण-नियम गति में धारण ।
क्रम से नित करती पन्थ पार योजनत्रिविंशत्,
होता समीप प्रत्येक पहुँचती दोषरहित ।
परिचित है दिन के प्रथम चरण के आगम से,
उज्ज्वलवदना उद्भूत हुई है वह तम से;
वह कांतिमति युवती प्रकाश का कर वर्षण,
रखती अखण्ड वह नियम बंधा जिससे जीवन ।
रुपसि कन्या सी अवगुण्ठन से मुक्त वदन,
कामनाशील सविता का करती स्वयं वरण;
उसके समक्ष यह युवति विभा सस्मित आनन,
उर का आवरण हटा, देती छबि का दर्शन ।
ज्यों मातृ-प्रसाधित वधू-गात लोचन-रोचन,
विच्छुरित प्रभा से आज उषा का सुन्दर तन;
तम का वारण कर ज्योतियी भद्रे ! धन्या !
तेरी समानता कर न सके अरुणा अन्या ।
यह अश्ववती गोमती विश्व से वरणीया,
रवि-रश्मि-प्रेरिता आती है नित कमनीया;
यह नित्य लौटती दूर दिशायों में जाकर,
मंगलरुपों में संकेतित मंगल के वर ।
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करती ध्रुव अनुसरण सूर्य-किरणों का तू नित,
भद्रे ! कर दे कर्म हमारे भद्र-निवेशित ।
तेरा यह आलोक करे अज्ञानों का क्षय,
प्राप्त हमें होताओं को, हो निधियों का चय ।
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