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सप्तपर्णा

ज्योतिष्मती

20 Jun 2025 · 1 मिनट पठन · guptadivya513

आ रही उषा ज्योति:स्मित !
प्रज्जवलित अग्नि है लहराती आभा सित ।

सब द्विपद चतुष्पद प्राणि जगत है चंचल,
सविता ने सब को दिया कर्म का सम्बल,
नव रश्मिमाल से भूमण्डल-परिवेषित !
आ रही उषा ज्योति:स्मित !

जो ऋत् की पालक मानव-युग-निर्मायक,
जो विगत उषायों के समान सुखदायक,
भावी अरुणायों में प्रथमा उदृभासित !
आ रही उषा ज्योति:स्मित !

आलोकदुकूलिनि स्वर्ग-कन्याका नूतन,
पूर्वायन-शोभी उदित हुई उज्ज्वलतन,
व्रतवती निरन्तर दिग् दिगंत से परिचित !
आ रही उषा ज्योति:स्मित !

उसके हित कोयी उन्नत है न अवर है,
आलोकदान में निज है और न पर है,
विस्तृत उज्ज्वलता सब की, सब से परिचित !
आ रही उषा ज्योति:स्मित !

रक्ताभ श्वेत अश्वों को जोते रथ में,
प्राची की तन्वी आई नभ के पथ में,
गृह गृह पावक, पग पग किरणों से रंजित !
आ रही उषा ज्योति:स्मित !

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